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गुन गोबिंद गाइयो नही जनमु अकारथ कीन , कहु नानक हरि भजु मना जिहि बिधि जल कौ मीन।

गुन गोबिंद गाइयो नही जनमु अकारथ कीन ,

कहु नानक हरि भजु मना जिहि बिधि जल कौ मीन। 

हरी के नाम से प्रीती उसका गुणगायन व्यक्ति के रोम रोम से ऐसे हो जैसी प्रीती और नेहा मच्छी का जल से होता है। मच्छी जल के बिना नहीं रह सकती और इतना ही नहीं जब उसको सब्जी बनाके लोग खा लेते हैं वह उसके बाद भी पानी मांगती रहती है। अनुभव होगा उन लोगों को के मच्छी खाने के बाद प्यास ज्यादा लगती है ऐसा हो रामनाम का स्तुतिगायन। 

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